कुछ दिन पूर्व हमारी गौशाला में एक व्यक्ति गाय खरीदने आया। सामान्यतः लोग गाय का मूल्य पूछते हैं और बाजार के अनुसार भाव तय करना चाहते हैं। परंतु इस बार मैंने सोचा कि पहले उसे वास्तविक स्थिति समझाई जाए। जब मैंने गाय के पालन-पोषण की लागत जोड़कर बताई, तो वह आश्चर्यचकित रह गया।
आज के समय में एक गाय के पीछे औसतन 100 रुपये प्रतिदिन का खर्च आता है। इसमें सूखा चारा, हरा चारा, दाना, खल, भूसा, पानी की व्यवस्था, दवाई, टीकाकरण, कर्मचारी का वेतन, बिजली, साफ-सफाई और गौशाला की मूलभूत व्यवस्थाएँ सम्मिलित हैं। यदि प्रतिदिन 100 रुपये मानें, तो एक वर्ष में 36,000 रुपये और तीन वर्षों में 1,08,000 रुपये का व्यय हो जाता है।
जब मैंने यह गणना सामने रखी, तो खरीदार के लिए यह केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक नई दृष्टि थी। उसे शायद पहली बार यह अनुभव हुआ कि गौशाला में गाय केवल खड़ी नहीं रहती, बल्कि उसके पीछे निरंतर सेवा और संसाधन समर्पित होते हैं।
सामाजिक अपेक्षा क्या है?
समाज की सामान्य अपेक्षा यह रहती है कि गौशाला सेवा भाव से चलती है, इसलिए गाय कम मूल्य पर मिलनी चाहिए। लोग यह सोचते हैं कि चूँकि गौशाला धार्मिक और सामाजिक संस्था है, इसलिए उसे लाभ नहीं कमाना चाहिए।
यह भावना अपने स्थान पर उचित है। गौशाला का उद्देश्य व्यापार नहीं, सेवा है। परंतु सेवा का अर्थ यह नहीं कि संस्था घाटे में चले। यदि हर गाय को लागत से कम मूल्य पर बेच दिया जाए, तो गौशाला की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होती जाएगी।
स्वाबलंबन की आवश्यकता
स्वाबलंबन का अर्थ है कि गौशाला अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं कर सके। यदि प्रत्येक गाय पर तीन वर्षों में 1,08,000 रुपये का व्यय हुआ है और उसे 60,000 या 70,000 रुपये में बेच दिया जाए, तो शेष राशि की भरपाई कहाँ से होगी?
दान और सहयोग महत्वपूर्ण हैं, परंतु केवल उन्हीं पर निर्भर रहना दीर्घकाल में स्थायी समाधान नहीं है। स्वाबलंबी गौशाला ही निरंतर सेवा कर सकती है।
यदि गौशाला घाटे में रहेगी, तो चारे की गुणवत्ता प्रभावित होगी, दवाइयों में कमी आएगी, कर्मचारियों का वेतन बाधित होगा और अंततः गायों की सेवा प्रभावित होगी। इसलिए लागत की गणना करना और उसके अनुरूप मूल्य निर्धारित करना आवश्यक है।
लागत बनाम बाजार भाव
बाजार प्रायः गाय का मूल्य उसके दूध उत्पादन के आधार पर तय करता है। यदि दूध अधिक है, तो मूल्य अधिक; यदि कम है, तो मूल्य कम। परंतु गौशाला की दृष्टि केवल दूध तक सीमित नहीं होती।
गाय गोबर और गौमूत्र भी देती है, जो जैविक खेती, खाद, गोबर गैस, धूप-दीप और अन्य गौ-आधारित उत्पादों के लिए उपयोगी हैं। यदि इन संसाधनों का समुचित उपयोग किया जाए, तो गौशाला की आय बढ़ सकती है और बिक्री पर निर्भरता कम हो सकती है।
संतुलन कैसे स्थापित हो?
गौशाला को दो बातों का संतुलन बनाना होगा—
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वास्तविक लागत की पूर्ति
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समाज की भावनाओं का सम्मान
यदि कोई सच्चा गौसेवक गाय ले जाना चाहता है और उसकी सेवा का संकल्प करता है, तो मूल्य में कुछ लचीलापन संभव है। परंतु यदि केवल सस्ते में खरीदने की मानसिकता हो, तो गौशाला को दृढ़ रहना चाहिए।
साथ ही, गौशाला को आय के अन्य स्रोत विकसित करने चाहिए—
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गोबर से जैविक खाद और वर्मी कम्पोस्ट
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गौमूत्र से जैविक उत्पाद
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गौ-आधारित हस्तनिर्मित सामग्री
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एक गाय गोद लेने की योजना
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पारदर्शी सदस्यता और सहयोग योजना
इन उपायों से गौशाला की आय विविध होगी और स्वाबलंबन सुदृढ़ होगा।
निष्कर्ष
गौशाला स्वाबलंबन और सामाजिक अपेक्षा के बीच संतुलन की चुनौती से गुजर रही है। एक ओर समाज कम मूल्य की अपेक्षा करता है, दूसरी ओर वास्तविक लागत निरंतर बढ़ रही है।
यदि लागत की अनदेखी कर दी जाए, तो गौशाला दीर्घकाल तक नहीं टिक पाएगी। और यदि केवल लाभ की दृष्टि अपनाई जाए, तो सेवा का मूल भाव समाप्त हो जाएगा।
अतः उचित मार्ग यही है कि पारदर्शिता के साथ वास्तविक लागत समाज के सामने रखी जाए, स्वाबलंबन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ और सेवा तथा अर्थशास्त्र के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।
गौशाला का उद्देश्य केवल गायों को आश्रय देना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जो आत्मनिर्भर, स्थायी और समाज के सहयोग से निरंतर चलती रहे। यही सच्चे अर्थों में गौसेवा है।
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