Tuesday, 16 July 2024

भजन करो भोजन करो अभियान - संत श्री आशाराम जी बापू का एक सफल प्रयास

  

 


     भजन करो भोजन करो और दक्षिणा पाओ अभियान  यह पूज्य पाद संत श्री आशाराम जी बापू का सम्पूर्ण  देश भर में  अनोखा प्रयास है | इस अभियान  की तहत गरीव बनवासी पिछड़े इलाको में मतान्तरण का शिकार हो रहे लोगो को एक नयी चेतना मिला | देश भर के पिछड़े बनवासी इलाकों में सेवा एक सफल प्रयास शुरू हुआ | इस अभियान के तहत निवाई गौशाला में भी इस कार्य को अधिकाधिक बढाया गया  |

    भारत में गरीबी और वृद्धावस्था अक्सर एक दुखद संयोजन होता है। ऐसे में कई वृद्ध लोग, जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं, अपने जीवन के आखिरी दिनों में पर्याप्त समर्थन और देखभाल से वंचित रहते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, पूज्य पाद संत श्री आशाराम जी के आश्रमों एवं समितिओं द्वारा  विशेष अभियान शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य देश भर में पिछड़े और बनवासी इलाकों में गरीव वृद्धों के जीवन को बेहतर बनाने  का सफल प्रयास किया गया |।

    इस अभियान का मुख्य ध्येय गरीव वृद्धों को न केवल शारीरिक सहायता प्रदान करना था , बल्कि उन्हें मानसिक और आध्यात्मिक संबल भी देना है। अभियान की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

भजन और कीर्तन

    इस अभियान के तहत, प्रत्येक दिन वृद्धों के लिए भजन और कीर्तन का आयोजन किया जाता है। भजन और कीर्तन से न केवल उनकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है, बल्कि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य में भी सुधार लाता है। धार्मिक और आध्यात्मिक भजन कीर्तन  से मन की शांति प्राप्त होती है और वृद्ध लोग अपने दैनिक जीवन की चिंताओं से कुछ पल के लिए मुक्त हो जाते हैं।

 एक समय का भोजन

    अभियान के तहत दोपहर के समय वृद्धों के लिए एक समय का पौष्टिक भोजन भी प्रदान किया जाता है। यह भोजन उनकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ उन्हें एक स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जीने में मदद करता है। भोजन की गुणवत्ता और पौष्टिकता का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि वृद्ध लोग स्वस्थ और तंदुरुस्त रह सकें।

 आर्थिक सहायता

    भजन और भोजन के साथ ही, प्रत्येक दिन शाम को वृद्धों को 100 रूपये की दक्षिणा भी प्रदान की जाती है। यह आर्थिक सहायता उन्हें अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने में सहायक होती है। वृद्ध लोग इस दक्षिणा का उपयोग अपनी दवाइयों, कपड़ों या अन्य आवश्यकताओं के लिए कर  ते हैं। इससे उन्हें आत्मनिर्भरता का एहसास होता है और वे अपनी आवश्यकताओं को बिना किसी पर निर्भर हुए पूरा कर  ते हैं।

 अभियान का संचालन

    यह अभियान देश भर के पिछड़े और बनवासी इलाकों में संचालित किया जा रहा है। इस अभियान में 35 वर्ष से ऊपर के गरीव वृद्ध लोग भाग ले  ते हैं। यह अभियान स्थानीय समिति , सामाजिक कार्यकर्ताओं और पूज्य पाद संत श्री आशाराम जी बापू का साधकों के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। प्रत्येक इलाके में स्थानीय समितियों का गठन किया गया है, जो इस अभियान के संचालन और प्रबंधन का जिम्मा संभालती हैं।

समाज पर प्रभाव

    इस अभियान का प्रभाव समाज के विभिन्न पहलुओं पर दिखाई दे रहा है। सबसे पहले, यह अभियान गरीव वृद्धों के जीवन को सम्मानजनक और सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वृद्ध लोग जो पहले असहाय और उपेक्षित महसूस करते थे, अब उन्हें एक नया जीवन मिलने का अनुभव हो रहा है। उनके चेहरे पर खुशी और संतोष की झलक दिखाई देती है।

    दूसरा, इस अभियान ने समाज में एक नई जागरूकता और संवेदनशीलता को जन्म दिया है। लोग अब वृद्धों के प्रति अधिक सहानुभूति और संवेदनशीलता का प्रदर्शन कर रहे हैं। यह अभियान समाज को यह संदेश देता है कि वृद्धों का सम्मान और देखभाल हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

सार बात 

    गरीव वृद्धों के लिए भजन, भोजन, और दक्षिणा का यह अभियान न केवल उनकी भौतिक जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि उन्हें मानसिक और आध्यात्मिक संबल भी प्रदान करता है। यह अभियान समाज में वृद्धों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस अभियान के माध्यम से, हम एक ऐसा समाज बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं जहां हर वृद्ध व्यक्ति को सम्मान, देखभाल और समर्थन मिले।





Monday, 15 July 2024

दुर्घटना ग्रस्त एवं रोग ग्रस्त गौवंश की चिकित्सा व्यवस्था




 समस्या की बढ़ती गंभीरता

    द्रुतगामी वाहनों के कारण गौवंश दुर्घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। ये घटनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं, जिससे कई गायें गंभीर रूप से घायल हो जाती हैं। इन दुर्घटनाओं के कारण न केवल गायों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि समाज पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए हमारी गौशाला ने एक समर्पित चिकित्सा व्यवस्था स्थापित की है, जो दुर्घटना ग्रस्त और रोग ग्रस्त गायों की देखभाल और उपचार में विशेषज्ञता रखती है।

 चिकित्सा और आश्रय की व्यवस्था

मारी गौशाला में दुर्घटना ग्रस्त गायों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समुचित चिकित्सा और आश्रय की व्यवस्था प्रदान की जाती है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि गायों को उचित चिकित्सा सहायता मिल रही है और उनके लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण उपलब्ध है। गायों की देखभाल में चिकित्सकों, कम्पाउंडरों और सहयोगियों की एक टीम जुटी रहती है, जो हर समय तैयार रहती है।


 चिकित्सा टीम और संसाधन

हमारी गौशाला में अनुभवी डॉक्टर और कम्पाउंडर तैनात हैं, जो गायों की चिकित्सा के लिए हर समय उपलब्ध रहते हैं। इनके साथ सहयोगी कर्मचारी भी होते हैं, जो चिकित्सा प्रक्रिया में मदद करते हैं और गायों की देखभाल में सहायता प्रदान करते हैं। चिकित्सा टीम की विशेषज्ञता और समर्पण के कारण गायों को सर्वोत्तम चिकित्सा सेवाएं मिलती हैं।

एम्बुलेंस सेवा

गायों को तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए हमारी गौशाला में एम्बुलेंस सेवा भी उपलब्ध है। यह एम्बुलेंस सेवा 24 घंटे चालू रहती है और दुर्घटना स्थल से घायल गायों को शीघ्रता से गौशाला पहुंचाने में सक्षम है। एम्बुलेंस में आवश्यक चिकित्सा उपकरण और संसाधन मौजूद होते हैं, जिससे गायों को प्राथमिक उपचार तुरंत मिल सके।

ऑनलाइन सूचना प्रणाली

हमारी गौशाला में एक ऑनलाइन सूचना प्रणाली भी स्थापित की गई है, जिसके माध्यम से दुर्घटनाओं की सूचना तुरंत प्राप्त की जा सकती है। यह प्रणाली 24 घंटे सक्रिय रहती है और किसी भी दुर्घटना की जानकारी तुरंत चिकित्सा टीम तक पहुंचाई जाती है। इस व्यवस्था के कारण चिकित्सा टीम जल्दी से जल्दी दुर्घटना स्थल पर पहुंच सकती है और गायों को समय पर चिकित्सा सहायता प्रदान कर सकती है।

24 घंटे चिकित्सा सुविधा

हमारी गौशाला में चिकित्सा सुविधा 24 घंटे उपलब्ध है। इसका मतलब यह है कि किसी भी समय कोई भी गाय घायल हो या बीमार हो, उसे तुरंत चिकित्सा सहायता मिल सकती है। हमारी चिकित्सा टीम हर समय सतर्क रहती है और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहती है। यह 24 घंटे की व्यवस्था गायों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को सुनिश्चित करती है।

 सर्जरी और प्राथमिक उपचार

गायों की गंभीर चोटों और बीमारियों के लिए हमारी गौशाला में सर्जरी और प्राथमिक उपचार की भी व्यवस्था है। चिकित्सा टीम सर्जरी के माध्यम से गायों की गंभीर चोटों का उपचार करती है और उन्हें स्वस्थ बनाने की कोशिश करती है। प्राथमिक उपचार के लिए आवश्यक सभी संसाधन और उपकरण मौजूद होते हैं, जिससे गायों को तत्काल राहत मिलती है।

 सेवा क्षेत्र की सीमा

हमारी गौशाला का सेवा क्षेत्र 15 से 20 किलोमीटर की सीमा तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र के भीतर किसी भी दुर्घटना या बीमारी की सूचना मिलते ही चिकित्सा टीम तुरंत हरकत में आ जाती है और गायों को चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए घटनास्थल पर पहुंचती है। यह सीमा सुनिश्चित करती है कि गायों को शीघ्रता से सहायता मिल सके और उनका उपचार तुरंत शुरू हो सके।

  चिकित्सा प्रक्रियाओं की विशेषताएं

गायों की चिकित्सा के दौरान विभिन्न प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। दुर्घटना के बाद, सबसे पहले गायों की स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है और फिर प्राथमिक उपचार दिया जाता है। इसके बाद, आवश्यक होने पर सर्जरी की जाती है और गायों की देखभाल की जाती है। चिकित्सा प्रक्रियाओं के दौरान गायों को विशेष पोषण और देखभाल भी प्रदान की जाती है, ताकि वे जल्दी से ठीक हो सकें।

  चिकित्सा टीम का समर्पण

हमारी चिकित्सा टीम का समर्पण और सेवा भाव ही हमारे प्रयासों की सफलता का आधार है। डॉक्टर, कम्पाउंडर और सहयोगी कर्मचारी सभी मिलकर गायों की देखभाल में योगदान देते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हर गाय को सर्वोत्तम चिकित्सा सहायता मिले। उनका सेवा भाव और समर्पण गायों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 समाज पर सकारात्मक प्रभाव

दुर्घटना ग्रस्त और रोग ग्रस्त गायों की चिकित्सा व्यवस्था के इन प्रयासों का समाज पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह न सिर्फ गायों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुनिश्चित करता है, बल्कि समाज में संवेदनशीलता और करुणा की भावना को भी बढ़ावा देता है। इन प्रयासों के माध्यम से, हम समाज को यह संदेश देने में सफल होते हैं कि जानवरों की देखभाल और संरक्षण हमारा नैतिक दायित्व है और इसे निभाना हमारे समाज के लिए आवश्यक है।

समग्र उद्देश्य और भविष्य की दिशा

हमारे संस्थान का उद्देश्य केवल दुर्घटना ग्रस्त और रोग ग्रस्त गायों को चिकित्सा सहायता प्रदान करना नहीं है, बल्कि उनके स्वास्थ्य और जीवन गुणवत्ता में सुधार करना भी है। इसके लिए, हम निरंतर नई तकनीकों और तरीकों का उपयोग करते हैं और अपने प्रयासों में सुधार करते रहते हैं। हमारे द्वारा किए गए ये प्रयास एक उदाहरण हैं कि कैसे हम अपने समाज और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभा सकते हैं और एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं।


---------------------------------------------



निराश्रित गौवंश की देखरेख और संरक्षण के प्रयास

 
गौ तस्करों से गौवंश को छुडाते हुए

  निराश्रित गौवंश को आश्रय प्रदान करना

पिछले 20 वर्षों में, हमारे संस्थान ने 10,000 से अधिक निराश्रित गौवंश को आश्रय प्रदान किया गया है। यह कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि गौ तस्करी से छुड़ाना और अन्य कारणों से कई गायें निराश्रित हो जाती हैं, और उनकी देखरेख करना समाज का नैतिक दायित्व है।

  गौ तस्करों से बचाव और चिकित्सा सहायता

गौ तस्करों से बचाकर लाए गए निराश्रित गौवंश को हमारे आश्रय में सुरक्षित रखा जाता है। यह प्रक्रिया सिर्फ शारीरिक सुरक्षा प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इन गायों की संपूर्ण देखरेख और पुनर्वास की भी जिम्मेदारी ली जाती है। गौवंश को तस्करों से बचाने के बाद, उन्हें तुरंत चिकित्सा सहायता दी जाती है और उनकी स्वास्थ्य स्थिति का पूरा ख्याल रखा जाता है।

  गौशालाओं में स्थानांतरण और देखरेख

हमारे गौशाला ने इन निराश्रित गौवंश व्यवस्था अनुसार इन को हमारे अन्य गौशालाओं में स्थानांतरित करने की व्यवस्था की है, ताकि उनकी बेहतर देखरेख की जा सके। इस प्रक्रिया में, हमारे विभिन्न गौशालाओं के बीच सहयोग स्थापित किया जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी गौवंश को उचित देखभाल मिले। गौवंश के लिए पर्याप्त स्थान, खाद्य और चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है, ताकि उनका स्वास्थ्य और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

  मुख्य गौशाला में सेवाएं

हमारी मुख्य गौशाला में वर्तमान में 1250 गौवंश की सेवा की जा रही है। इन गौवंश की देखरेख में कई गतिविधियाँ शामिल हैं, जिनमें उनकी स्वास्थ्य जांच, पोषण की व्यवस्था, और आवास सुविधाएं शामिल हैं। गौशाला में टीन चद्दर की शेड बनाकर इनकी नस्ल सुधार की प्रक्रिया चालू है। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य निराश्रित गायों को दुधारू गायों में बदलना है, जिससे वे समाज के लिए और भी उपयोगी बन सकें।

  नस्ल सुधार और उत्पादन क्षमता में वृद्धि

नस्ल सुधार की प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे गायों की उत्पादन क्षमता में सुधार होता है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाले बैल और गायों का चयन किया जाता है, जो अच्छी नस्ल के माने जाते हैं। इन्हें उचित देखरेख और पोषण प्रदान किया जाता है, ताकि उनकी संताने भी उच्च गुणवत्ता वाली हों। यह प्रक्रिया सिर्फ दूध उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि गायों की समग्र स्वास्थ्य स्थिति को भी सुधारने में सहायक है।

आधुनिक तकनीकों और तरीकों का उपयोग-

गौशाला में गायों की देखरेख के लिए विभिन्न आधुनिक तकनीकों और तरीकों का भी उपयोग किया जा रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से गायों की स्वास्थ्य स्थिति की निरंतर निगरानी की जाती है और उनकी देखरेख में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, नियमित स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण और पोषण की योजना बनाई जाती है, ताकि गायें स्वस्थ और उत्पादक बनी रहें।

  स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण -

गौशाला में गायों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण प्रदान किया जाता है। इसमें उनके आवास, खाद्य और जल की व्यवस्था शामिल है। टीन चद्दर की शेड बनाकर उन्हें मौसम की कठोरताओं से सुरक्षित रखा जाता है और उनके लिए एक आरामदायक आवास सुनिश्चित किया जाता है। इसके साथ ही, उन्हें उच्च गुणवत्ता वाला चारा और पोषण प्रदान किया जाता है, जिससे उनका स्वास्थ्य बेहतर बना रहे।

  स्थानीय समुदाय की भूमिका

गौशाला में गायों की देखरेख के लिए स्थानीय समुदाय की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। स्थानीय लोग अपने समय और संसाधनों का योगदान देकर इन गायों की देखरेख में मदद करते हैं। इसके अलावा, कई स्वयंसेवी संगठन और संस्थान भी इस प्रयास में सहयोग कर रहे हैं। यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी गायों को उचित देखरेख और सुविधाएं मिल रही हैं, ताकि वे स्वस्थ और सुरक्षित रह सकें।

  समाज पर सकारात्मक प्रभाव

गौवंश संरक्षण और देखरेख के इन प्रयासों का समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यह न सिर्फ गायों की सुरक्षा सुनिश्चित किया है, बल्कि समाज में संवेदनशीलता और करुणा की भावना को भी बढ़ावा दिया है। इन प्रयासों के माध्यम से, हम समाज को यह संदेश देने में सफल हुए हैं कि गायों की देखरेख और संरक्षण हमारा नैतिक दायित्व है और इसे निभाना हमारे समाज के लिए आवश्यक है।

  समग्र उद्देश्य और भविष्य की दिशा

हमारे गौशाला का उद्देश्य केवल निराश्रित गौवंश को आश्रय प्रदान करना नहीं है, बल्कि उनके स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता में सुधार करना भी है। इसके लिए, हम निरंतर नई तकनीकों और तरीकों का उपयोग करते हैं और अपने प्रयासों में सुधार करते रहते हैं। हमारे द्वारा किए गए ये प्रयास एक उदाहरण हैं कि कैसे हम अपने समाज और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभा सकते हैं और एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं।

-------------------------



Wednesday, 10 July 2024

बायोगैस का प्रयोग - गौशाला आधारित दृष्टिकोण

 



    गोबर गैस प्लांट की स्थापना के बाद इसे गोबर व पानी के घोल (1 : 1) से भर दिया जाता है और चलते हुए प्लांट से निकला गोबर (दस प्रतिशत) भी साथ ही डाल दिया जाता है। इसके बाद गैस की निकासी का पाइप बंद करके 10-15 दिन छोड़ दिया जाता है। जब गोबर की निकासी बाते स्थान से गोबर बाहर आना शुरू हो जाता है तो प्लांट में ताजा गोबर प्लांट के आकार के अनुसार सही मात्रा में हर रोज एक बार डालना शुरू कर दिया जाता है तथा गैस को आवश्यकतानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है एवं निकलने वाले गोबर को उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है जो गुणवत्ता के हिसाब से गोबर की खाद के बराबर होता है।

    तालिका 1 : विभिन्न क्षमता के संशाधित गोबर गैस प्लांट लगाने की लागत बनाने के लिए सामग्री की मात्रा

    11350 रू. प्रति हजार; 2140 रू. प्रति थैला; 312 रू. प्रति घन फुट; 47 रू. प्रति घन फुट; 530 रू. प्रति फुट; 6100 रू. प्रति मीटर; 7100 रू. प्रति लीटर

    तलिका 2 : विभिन्न क्षमता से संशोधित बायोगैस प्लांट के लिए पशुओं तथा निर्वाहित व्यक्तियों की संख्या

संशोधित गोबर गैस प्लांट

    जनता व दीनबन्धु डिजाइन के गोबर गैस प्लांट पानी व गोबर के घोल द्वारा चलाए जाते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध न होने के कारण किसान गोबर गैस प्लांट लगवाने के लिए तैयार नहीं होते। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग ने गोबर व पानी के घोल द्वारा चलने वाले जनता मॉडल के बायोगैस प्लांट को संशाधित करके ऐसा डिजाईन तैयार किया है जो ताजे गोबर से चलता है। इस प्लांट को गोबर डालने का आर सी पी पाइप एक फुट चौड़ा तथा पृथ्वी से 4 फुट ऊॅंचाई पर बना होता है। प्लांट के अंदर का भाग लीकेज रहित बनाया जाता है तथा गोबर की निकासी का पाइप पर्याप्त चौड़ा रखा जाता है जिससे गोबर गैस के दबाव से स्वत: बाहर आ जाता है। गैस की निकासी के स्थान को जी.आई. प्लास्टिक पाइप द्वारा रसाईघर तक चूल्हे से या फिर ईंजन द्वारा जोड़ दिया जाता है। इस प्लांट में बनी गैस की मात्रा अन्य सयंत्रों की अपेक्षा ज्यादा होती है तथा निकलने वाला गोबर जल्दी सूख जाता है जिसे इकट्ठा करने के लिए खङ्ढे की जरूरत नहीं पड़ती। इस प्लांट के आसपास की जगह साफ-सुथरी रहती है तथा इसे बनाने का खर्च अन्य संयंत्रों की अपेक्षा कम आता है (तालिका 1, 2)।

यदि आप कालोनी में या शहर में रहते हैं... आपका दो कमरे का मकान है... या आप कहीं चौथी मंजिल पर रहते हैं, तो भी आप गौपालन कर सकते हैं ।। भारतीय गौवंश के संरक्षण में आप भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं... यह काम आर्थिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही... स्वास्थ्य रक्षण का बेहतरीन काम भी सामुहिक रूप से गौशाला खोलकर किया जा सकता है... 

    एक बात.. सौ टके की... 

     भारतीय नस्ल की गाय विश्व में सर्वोत्तम मानी जाती है ।। पुराणों में और आयुर्वेद में दूध के जो श्रेष्ठ गुण वर्णित हैं, उनका संबंध कामधेनु कहलाने वाली भारतीय नस्ल की गायें से ही है ।। मां केदुध के पश्चात् सर्वाधिक लाभदायक, रोगों से लड़ने की शक्ति देने वाला, सुपाच्य, कम वसा युक्त, दैवी संस्कारों से युक्त तथा कैरोटीन युक्त दूध केवल भारतीय नस्ल की गाय ही देती है ।। इसी के दही, छाछ और घी का महत्व वर्णन किया जाता है ।। 

    भैंस का, जर्सी या संकर गायों का, सोयाबीन का या रासायनिक दूध, वह दूध नही है जिससे सही अर्थों में हमारा तन- मन स्वास्थ रह सके ।। मगर बाजार में तो यही सब मिल रहा है और मजबूरी में हम इसे ही ले भी रहे हैं ।। अब तो प्लास्टिक थैली में पैक दूध और पावडर दूध चलन में है जिसकी गुणवत्ता के बारे में कुछ कहना ही बेकार है ।। 

    बजारू दूध से बढ़ती बीमारियाँ- 

    राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के पशु शरीर क्रिया विज्ञान के वैज्ञानिकों के अनुसार आजकल पशुपालक दूध निकालने की प्रक्रिया में आक्सीटोसीन हार्मौन्स इंजेक्शन का बहुतायत से प्रयोग कर रहे हैं ।। यह इंजेक्शन सस्ता और लगाने में आसान होता है, इसके लगाने से पशु 20 प्रतिशत तक अधिक दूध देता है ।। अतः आजकल इसका अंधाधुंध उपयोग हो रहा है परन्तु इससे स्वास्थ्य भी तेजी से बिगड़ते जा रहा है ।। 

    महिलाओं में बार- बार गर्भपात होना, लड़कियों का कम उम्र में वयस्क हो जाना, स्तन कैंसर की शिकायतों का बढ़ना, बच्चों की आंखें, फेफड़े व दिमाग में खराबी आदि की शिकायतों के पीछे ऐसा दूध ही कारण है ।। जिन पशुओं को आँक्सीटोसीन देकर दूध निकाला जाता है, उनके दूध में कैल्शियम और वसा की कमी हो जाती है और सोडियम तथा नमक की मात्रा बढ़ जाती है ।। 

    सामुहिक गौशाला खोलिये- 

       आज जब आदमी 40- 40 हजार रु. की मोटर सायकल खरीद रहा है तब कुछ लोग थोड़ी- थोड़ी रकम लगाकर 10- 15 देशी गाय खरीदकर सामुहिक रूप से एक जगह उनका पालन- पोषण कर सकते हैं ।। अलग- अलग गाय पालने से यह बेहतर है ।। गौसेवा का पुण्य मिलेगा, शुद्ध दूध भी मिलेगा, आप एक परिवार को रोजगार भी दे सकेंगे और चाहे तो गोबर एवं गौ मूत्र से अन्य छोटे उद्योग भी चलाए जा सकते हैं ।। यह सामुहिक प्रयास समाज में सहकारिता, सहयोग और पारिवारिक भावना बढ़ाने वाला भी होगा... तब क्या विचार है... ?? 

        गाय का जीवन... हमारे स्वास्थ्य, संस्कृति, प्राकृतिक पर्यावरणीय संतुलन, अर्थतंत्र, कृषि, ऊर्जा सभी क्षेत्रों में कल्याणकारी प्रभाव डालता है। औद्योगिकीकरण, सर्वत्र हो रहा रासायनीकरण, शहरीकरण एवं तथाकथित आधुनिकीकरण के बढ़ते प्रयासों ने आज अनेकों उपद्रव खड़े कर दिये हैं। गौ पालन एवं संवर्धन द्वारा समाज में पुनः सुख समृद्घि का वातावरण लाया जा सकता है। इसी निमित्त से जन मानस को तैयार करना, इन गौ संवर्धन दीप यज्ञों का उद्देश्य है। 

       इन दीप यज्ञों का आयोजन ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही क्षेत्रों में किया जाना है। शहरों में इसलिए क्योंकि गौ आधारित औषधि उत्पादनों की शहरी क्षेत्रों में अधिक आवश्यकता है तथा हमारे शहर उनउत्पादों की बिक्री के लिए अच्छे बाजार का काम कर सकते हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि शहरों में धन साधन अधिक हैं, जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में भेजकर गौ संरक्षण संवर्धन की योजनाओं को बल प्रदान किया जा सकता है।

सावधानियाँ

1- गोबर गैस प्लांट लीकेज रहित होना तथा अच्छी किस्म की सामग्री से बना होना चाहिए।

2- गैस पाइप एवं अन्य उपकरण समय-समय पर जाँच करते रहना चाहिए।

3- गोबर की सूखी पर बनने से रोकने के लिए गोब डालने का एवं गोबर निकलने का पाइप ढका रहना चाहिए।

4- यह प्लांट निर्देशानुसार चलाने से वर्षों तक चल सकते हैं, जिससे गैस एवं खाद दोनो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर निम्नलिखित पते पर संपर्क किया जा सकता है -

अध्यक्ष, 

सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग, चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार - 125 004

source-http://hindi.indiawaterportal.org/node/29271



  *       *       *       *       *



Tuesday, 9 July 2024

गोबर गैस प्लांट की उपयोगिता- एक व्यापक दृष्टि कोण

 

 



    किसानों की दो मुख्य समस्याँए हैं - पहली उर्वरक तथा दूसरी ईंधन की कमी, जो तरह-तरह की कठिनाईयाँ पैदा कर रही है। किसानों को गोबर तथा लकड़ी के अलावा अन्य कोई पदार्थ सुगमतापूर्वक उपलब्ध नहीं है। अगर किसान गोबर का उपयोग खाद के रूप में करता है तो उसके पास खाना पकाने के लिए ईंधन की समस्या बन जाती है। जैसा कि हमें विदित है मृदा की उर्वरक शक्ति ज्यादा फसल पैदा करने से काफी कमजोर हो गई है तथा संतुलित पोषक पदार्थ उपलब्ध नहीं करवा पा रही है। दूसरी ओर रासायनिक खादों के उपयोग से पर्यावरण भी दूषित हो रहा है। इनके प्रयोग में लागत भी ज्यादा आती है तथा इनके मिलने में भी कई बार कठिनाई आती है।

    इन समस्याओं का समाधान गोबर का दोहरा प्रयोग करके किया जा सकता है। गोबर में ऊर्जा बहुत बड़ी मात्रा में होती है जिसको गोबर गैस प्लांट में किण्वन (फर्मंटेशन) करके निकाला जा सकता है। इस ऊर्जा का उपयोग र्इंधन, प्रकाश व कम हॉर्स पावर के डीजल ईंजन चलाने के लिए किया जा सकता है। प्लांट से निकलने वाले गोबर का खाद के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं। अत: गोबर गैस प्लांट लगाने से किसानों को र्इंधन व खाद दोनों की बचत होती है।

    गोबर गैस प्लांट लगाने के लिए निम्नलिखित आवश्यकताओं का होना जरूरी है :

1- गोबर गैस से छोटे से छोटा प्लांट लगाने के लिए कम से कम दो या तीन पशु हमेशा होने चाहिए।

2- गैस प्लांट का आकार गोबर की दैनिक प्राप्त होने वाली मात्रा को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

3- गोबर गैस प्लांट गैस प्रयोग करने की जगह के नजदीक स्थापित करना चाहिए ताकि गैस अच्छे दबाव पर मिलता रहे।

4- गोबर गैस प्लांट लगवाने के लिए उत्ताम किस्म का सीमेंट तथा ईंटें प्रयोग करनी चाहिएं। छत से किसी प्रकार की लीकेज नहीं होनी चाहिए।

5- गोबर गैस प्लांट किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की देखरेख में बनवाना चाहिए।


Source:  ग्रामीण सूचना एवं ज्ञान केन्द्र

स्रोत --http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/

Literature_Life_Transforming/

Books_Articles/deeps/gosha


  *       *       *       *       *



भारत में बायोगैस - गौशाला आधारभूत परियोजना

 





भारत में बायोगैस 

भारत में मवेशियों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है इसलिए बायोगैस के विकास की प्रचुर संभावना है। बायोगैस (मीथेन या गोबर गैस) मवेशियों के उत्सर्जन पदार्थों को कम ताप पर डाइजेस्टर में चलाकर माइक्रोब उत्पन्न करके प्राप्त की जाती है। जैव गैस में 75 प्रतिशत मेथेन गैस होती है जो बिना धुँआ उत्पन्न किए जलती है। लकड़ी, चारकोल तथा कोयले के विपरीत यह जलने के पश्चात राख जैसे कोई उपशिष्ट भी नहीं छोड़ती है। ग्रामीण इलाकों में भोजन पकाने तथा ईंधन के रूप में प्रकाश की व्यवस्था करने में इसका उपयोग हो रहा है।

राष्ट्रीय बायोगैस विकास कार्यक्रम (1981-82) के अंतर्गत पारिवारिक या घरेलू तथा सामुदायिक दो प्रकार के संयंत्रों की स्थापना की जाती है। इससे स्वच्छ व सस्ती ऊर्जा आपूर्ति तथा ग्रामीण पर्यावरण की सफाई के साथ ही उच्च कोटि की कार्बनिक खाद भी प्राप्ति होती है क्योंकि जैव गैस के लिए प्रयुक्त गोबर तथा जल के कर्दम में नाइट्रोजन व फास्फोरस प्रचुर मात्रा में होते हैं। सावधानी केवल यह बरतनी चाहिए कि बायोगैस संयंत्र की 15 मीटर की परिधि में कोई पेयजल स्रोत न हो।

बायोगैस संयंत्र से लाभ  

भारत के तराई एवं मैदानी क्षेत्रों में गोबर को उपलों (कण्डों / गोइंठा) के रूप में सुखा रूप में प्रयोग किया जाता है कर ईंधन के। इससे गोबर में मौजूद पौधों के लिये पोषणकारी अधिकांश तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। उपला बनाने में प्रतिदिन करीब 1-2 घंटे समय भी लगता है। अतः खाना पकाने हेतु गोबर के उपलों के स्थान पर गोबर से बायो गैस बना कर बायो गैस को ईंधन के रूप में प्रयोग करने से पोषक तत्वों कि हानि नहीं होती है क्योंकि बायो गैस से प्राप्त बायो गैस स्लरी में पौधों के लिये उपयोगी सभी पोषक तत्त्व उपलब्ध रहते है (नष्ट नहीं होते), साथ ही खाना बनाने में धुँआ नहीं होता है जिससे गृहणी कि आँखों पर कोई प्रतिकूल असर भी नहीं पड़ता है। बायो गैस स्लरी को सीधे या छाया में सुखाकर या वर्मी कम्पोस्ट बनाकर खाद के रूप में खेतों में प्रयोग करना चाहिए। बायो गैस से आजकल डीजल पम्प सेट भी चला सकते है जिससे डीजल एवं अन्य उर्जा कि बचत होती है।

बायो गैस (गोबर गैस) पर्यावरण के अनुकूल है एवं ग्रामीण क्षेत्रो के लिए बहुत उपयोगी है।

बायोगैस उपलब्ध होने पर खाना पकाने में लगने वाली लकड़ी के उपयोग को कम कर सकते है, फलस्वरूप पेड़ों को भी बचाया जा सकता है।

बायो गैस के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल (गोबर आदि) की आपूर्ति गाँवो से ही पूरी हो जाती है। कहीं और से कच्चे माल को आयात करने की आवश्यकता नहीं है।

लकड़ी और गोबर के चूल्हे में बहुत धुआं निकलता है जो गृहणियों के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है। परन्तु बायो गैस के प्रयोग से धुआं नहीं निकलता है जिससे स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों के रोकथाम में सहायता मिलती है।

यह सयंत्र बायोगैस के साथ-साथ फसल उत्पादन के लिए उच्च गुणवता वाला खाद भी हमें देता है। जिसे नीचे दी गयी तालिका में दर्शाया गया है:

खाद का प्रकार नाइट्रोजन (%) पोटैशियम (%) फ़ास्फ़रोस (%)

फार्म की खाद (घूरे की खाद) 0.5-1 0.5-0.8 0.5-1

डाइजेस्टर स्लरी (तरल) 1.5-2 1 1

डाइजेस्टर स्लरी (सूखी) 1.3-1.7 0.85 0.85

बायोगैस पाँक (स्लरी)  

बायोगैस संयंत्र में गोबर की पाचन क्रिया के बाद 25% ठोस पदार्थ का रूपान्तर गैस के रूप में होता है और 75% ठोस पदार्थ का रूपान्तर खाद के रूप में होता है। 2 घन मीटर के गैस संयंत्र में जिसमें करीब 50 किलो गोबर रोज या 18-25 टन गोबर एक वर्ष में डाला जाता है, उस गोबर से 80% नमीयुक्त करीब 10 टन बायोगैस स्लरी का खाद प्राप्त होता है।

यह खेती के लिये अति उत्तम खाद होता है इसमें नाइट्रोजन 1.5 से 2% फास्फोरस 1.0% एवं पोटाश 1.0% तक होता है। बायोगैस संयन्त्र से जब स्लरी के रूप में खाद बाहर आता है तब जितना नाइट्रोजन गोबर में होता है उतना ही नाइट्रोजन स्लरी में भी होता है, परन्तु संयन्त्र में पाचन क्रिया के दौरान कार्बन का रूपान्तर गैस में होने से कार्बन का प्रमाण कम होने से कार्बन नाइट्रोजन अनुपात कम हो जाता है व इससे नाइट्रोजन का प्रमाण बढ़ा हुआ प्रतीत होता है।

बायोगैस संयन्त्र से निकली पतली स्लरी में 20% नाइट्रोजन अमो। निकल नाइट्रोजन के रूप में होता है अतः यदि इसका तुरन्त उपयोग खेत में नालियाँ बनाकर अथवा सिंचाई के पानी में मिलाकर खेत में छोड़ दिया जाए तो इसका लाभ रासायनिक खाद की तरह से फसल पर तुरन्त होता है और उत्पादन में 10 से 20% तक बढ़त हो सकती है। स्लरी खाद को सुखाने के बाद उसमें नाइट्रोजन का कुछ भाग हवा में उड़ जाता है। यह खाद असिंचित खेती में एक हेक्टर में करीब 5 टन व सिंचाई वाली खेती में 10 टन प्रति हेक्टर के प्रमाण में डाला जाता है। बायोगैस स्लरी के खाद में मुख्य तत्वों के अतिरिक्त सूक्ष्म पोषक तत्व एवं ह्यूमस भी होता है जिससे मिट्टी का पोत सुधरता है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और सूक्ष्म जीवाणु बढ़ते है। इस खाद के उपयोग से अन्य जैविक खाद की तरह 3 वर्षों तक पोषक तत्व फसलों को धीरे-धीरे उपलब्ध होते रहते है।

बायोगैस स्लरी को सुखाकर उसका संग्रहण करना 

यदि गोबर गैस संयंत्र घर के पास व खेत से दूर है तब पतली स्लरी को संग्रहण करने के लिये बहुत जगह लगती है व पतली स्लरी का स्थानान्तरण भी कठिन होता है ऐसी अवस्था में स्लरी को सूखाना आवश्यक है। इसके लिये ग्रामोपयोगी फिल्ट्रेशन टैंक की पद्धति विकसित की गई है। इसमें बायोगैस के निकास कक्ष से जोड़कर 2 घनमीटर के संयन्त्र के × 0.6 मीटर × 0.5 मीटर लिये 1.65 मीटर के दो सीमेन्ट के टैंक बनाये जाते हैं इसकी दूसरी तरफ छना हुआ पानी एकत्र करने हेतु एक पक्का गड्ढ़ा बनाया जाता है। फिल्ट्रेशन टैंक में नीचे 15 से.मी. मोटाई का काड़ी कचरा, सूखा कचरा, हरा कचरा, इत्यादि डाला जाता है। इस पर निकास कक्ष से जब द्रव रूप की स्लरी गिरती है तब स्लरी का पानी कचरे के थर से छन कर नीचे गड्ढ़े जाता है में एकत्र हो। इस तरह जितना पानी बायोगैस संयंत्र में गोबर की भराई के समय डाला जाता है उसका 2/3 हिस्सा गड्ढ़े में पुनः एकत्र हो जाता है इसे गोबर के साथ मिलाकर पुनः संयंत्र में डालने से गैस उत्पादन बढ़ जाता है। इसके अलावा इसमें सभी पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में होते है अतः पौधों पर छिड़काव करने से पौधों का विकास अच्छा होता है, एवं फल में वृद्धि होती है। करीब 15-20 दिनों में पहला टैंक भर जाता है तब इस टैंक को ढक कर स्लरी का निकास दूसरे टैंक में खोल दिया जाता है, इसका भंडारण अलग से गड्ढ़े में किया जा सकता है अथवा इसको बैलगाड़ी में भरकर खेत तक पहुँचाना आसान होता है।

फिल्ट्रेशन टैंक की मदद से कम जगह में अधिक बायोगैस की स्लरी का संग्रहण किया जा सकता है व फिल्टर्ड पानी के बाहर निकलने व उसका संयन्त्र में पुनः उपयोग करने से पानी की भी बचत होती है।

इस प्रकार बायोगैस संयन्त्र से बायोगैस द्वारा ईंधन की समस्या का समाधान तो होता ही है साथ में स्लरी के रूप में उत्तम खाद भी खेती के लिये प्राप्त होता है। अतः बायोगैस संयन्त्र को बॉयोडंग स्लरी खाद संयंत्र भी कहा जाना उचित होगा।

source--https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A5%88%E0%A4%B8



*       *       *       *       *




गौशाला निवाई में कार्य क्रियान्वयन- एक विस्तृत विवरण

 




    पूज्य बापूजी के कथनानुसार गोमाता को हम नहीं पालते गोमाता हमें पालती है. इसी बात को चरितार्थ करते हुए गौशालाओं को स्वावलंबी बनाने हेतु पंचगव्य उत्पादों, केचुआ खाद निर्माण व गोबर गैस संयंत्र द्वारा विद्युत निर्माण आदि कार्यक्रम प्रारंभ किये गये, इसी बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पहलुओं पर कार्य प्रारंभ किया गया.

               निवाई गौशाला द्वारा प्रायोजित इस राष्ट्रव्यापी रचनात्मक तथा सृजनात्मक गोसेवा महाभियान की सुपरिणामकारी सफलता हेतु इसे सत्पुरुषों से अनुमोदित, विवेक के प्रकाश में निम्नलिखित 9 नौ चरणों में विभक्त किया गया।

1 गोसंरक्षण,2 गोपलन,3 गोसंवर्धन,4 पंचगव्य संकलन,परिष्करण एवं विनियोग,5 सत्संग,6 सत्संस्कार7 स्वास्थ्य,8 स्वावलम्बन 9पर्यावरण संरक्षण

1 -गौ -संरक्षण

      गौशाला  पहुँचने वाले प्रत्येक अनाश्रित,  अपंग, लाचार, दुर्घटनाग्रस्त एवं कत्लखानों में जाने से छुड़ाए गये गोवंश को सर्वप्रथम यहीं प्रवेश मिलता है। चिकित्सालय में प्राथमिक उपचार के पश्चात गोवंश को उनकी शारीरिक स्थिति एवं सेवा-सुश्रुषा की आवश्यकता के अनुसार बनाई गई विभिन्न श्रेणियों के विभागों में भेजा जाता है तथा गंभीर स्थिति वाले गोवंश को पूर्ण स्वास्थ्य लाभ मिलने तक विशेष ध्यान दिया जाता है। सभी गौशालाओं में गोमाता के उपचार हेतु गो चिकित्सा कक्ष व डॉक्टर की सुविधा है.\

,2- गोपलन

       गोमाताओं के लिए नेत्रहीनता, गर्भाशय, फेफड़ों, हड्डियों तथा कैंसर घाव आदि से सम्बन्धित सभी बीमारियों के अलग-अलग विभाग वर्गीकृत है। साथ ही भिन्न-भिन्न बीमारियों में दिए जा सकने वाले अलग-अलग तरह के भोजन निश्चित मापदण्डानुसार निश्चित समय पर बदल-बदलकर दिये जाते हैं। जहाँ सर्दियों में वृद्ध गोवंश को दोनों समय लापसी, मक्की, मेथी, अजवायन, सोआ, गुड़, तेल आद  खिलाया जाता है, वहीं गर्मियों में ठण्डे रहने वाले ‘‘जौ’’आदि खिलाये जाते हैं।

     

    गौ ओंको ठहर ने हेतु और वर्षों ,सर्दी, गर्मी से बचने हेतु  तथा गौओं के स्वास्थ्य , प्रकार ,जाती ,आदि आदि को ध्यान में रखतेहुए अलग अलग प्रकार की गौ आवास का निर्माण किया गया है | अवास अतिरिक्त चारा खाने की ठाण  और पानी  पिने की कुंड भी निर्माण किया गया है |

यहांपर  गो-चिकित्सा हेल्प लाईन के माध्यम से 1 मोबाईल एम्बुलेंस भी  सेवारत है।

3-गोसंवर्धन

     प्रतिवर्ष सैंकड़ों उन्नत नस्ल के नन्दी (सांड) तैयार करके देश के विभिन्न गोग्रामों एवं गोशालाओं को दिया जाता   है तथा गरीब किसानों को प्रतिवर्ष सैंकड़ों जोड़ी सशक्त एवं सुडौल बैल अत्यल्प शुल्क में उपलब्ध करवाता है। नाकारा सांडो को हजोरों की संख्या में गोसेवा केन्द्रो में प्रवेश दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त शताधिक  गिर ,थारपारकर आदि श्रेष्ठ कुलीन सांड उपलब्ध कराये जा रहे है जिससे एक साथ लाखों गायों का संवर्धन हो रहा है ।

4-पंचगव्य संकलन, परिश्करण एवं विनियोगः-

     सभी गोसेवाश्रमों में गोबर निर्मित जैविक खाद तैयार कर आस-पास के गोपालक किसानों को अल्प शुल्क में वितरित की जाती है।  गोबर से केंचुआ खाद का निर्माण होता है तथा ढ़गला खाद भी बनाई जाती हैद्वारा स्वस्थ गो-बछडि़यो के गोमूत्र से अर्क बनाया जाता है। गोमूत्र अर्क, गोमय, दही तथा गोघृत के संयोग से सर्वरोगहर पंचगव्य औशधियों का निर्माण तथा सस्ती दर पर वितरण किया जाता है। स्थानीय नागरिकों को  उचित मूल्य में दूध   वितरित होता है। समय समय पर तक्र (छाछ) गरीबों तथा अभाव ग्रस्तों में अल्प शुल्क पर वितरित की जाती है। यही नहीं औशध, यज्ञ, पूजा तथा अनुश्ठान के लिए शुद्ध गोघृत उचित मूल्य पर उपलब्ध करवाया जाता है। कई स्थानों में पंचगव्य वितरण केन्द्र संचालित है ।

5- सत्संग:-

   गोपाश्टमी आदि उत्सवो पर देश के महान् संत-महात्माओं द्वारा गोमहिमा, पंचगव्य की पवित्रता पर सदुपदेश, सच्चर्चा,सत्कथा तथा सच्चिन्तन एवं योग के माध्यम से व्यक्ति, समाज व राश्ट्र का नैतिक, चारित्रिक एवं आध्यात्मिक उत्थान करवाने का विनम्र प्रयास किया जा रहा है। । सत्संग से सेवक का जन्म होता है और सेवक से सेवा का सम्पादन होता है। सत्संग की दिव्य भूमि से ही मानवता का अवतरण होता है। मानवता प्राप्त मानव ही अपने लिए,जगत तथा जगदीष्वर के लिए उपयोगी होता है। ऐसा सत्पुरुशों का अनुभव सिद्ध मत है इसलिए सत्संग अनुपम है। गौशाला के  इस प्रयास के पीछे यही पावन उद्देष्य है।

6-सत्संस्कार:-

    वृद्ध,अपंग,अशक्त गोवंश की सामूहिक सेवा,सुवृश्टि यज्ञ, जप-अनुश्ठान, उपवास, स्वाध्याय, गोवत्स एवं गोभक्त पाठषाला,, सत्साहित्य प्रकाशन व प्रचार-प्रसार, व्रतोत्सव आदि पर शिविर, सभाएँ एवं सम्मेलनों द्वारा गोसेवा, प्राणी रक्षा, मानव हितकारी पर्यावरण शुद्धता एवं राश्ट्र उत्थान के संस्कार प्रेशित किये जाते हंै।

7-स्वास्थ्य:-

     शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक रोगोपचार हेतु  परिसर में ही एक पंचगव्य प्राकृतिक योग चिकित्सा स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना की गई है। चहाँ रोगियों के रोगों की जांच,परीक्षण व उपचार का प्रबन्ध है। पिछड़े क्षेत्रों में स्वास्थ्य वाहन द्वारा गरीबों को निःशुल्क पंचगव्य औशधियों का वितरण किया जाता है। गोधाम की पंचगव्य औशधियों से हजारों रोगी स्वस्थ हुए हैं । बड़ी-बड़ी बीमारियों का शमन हुआ है तथा सब प्रकार के रोगियों का उपचार होता है। हमारे स्वास्थ्य केन्द्र पर अमीर-गरीब सभी निःसंकोच भाव से आकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।


8-स्वावलम्बन:-गौशाला में समय-समय पर प्रदेश के ग्रामीण व शहरी किसानों को देते रहते है.

     स्वरोजगार तथा स्वावलम्बन हेतु वर्श में कई बार छोटे-बड़े प्रशिक्षण शिविर आयोजित होते हंै जिसमें व्यक्ति, परिवार एवं गांव को स्वावलम्बी बनाने की प्रक्रियाएँ गो-रक्षण, पंचगव्य उत्पाद निर्माण व् केचुआ खाद के संबंध में सिखाई जाती हंै। इन प्रशिक्षण शिविरों में से निकलकर सैकड़ों व्यक्तियों ने परिवार एवं गाँवों को स्वावलम्बी बनाने का सर्वहितकारी कार्य प्रारम्भ किया है।

9-पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षरोपण

   गौशाला क्षेत्र में नीम ,पिपल ,बड ,लेसुडे ,सिरिस ,सीसम  आदि छायादार   व फल दा र पेड़ जैसे आमला जामुन  निम्बू व अनार की कई हजार पेड़ लगा कर पर्यावरण की सुरक्षा  कर ने में  अग्रणी भूमिका निभाई है |

 गौशालाओं में गोबर व गौमूत्र द्वारा आवासित कर विभिन्न जड़ी-बूटियों का निर्माण गौशालाओं में किया जाता है.



*       *       *       *       *


Monday, 8 July 2024

गौशाला में गायों की देखभाल: एक अवलोकन

 





    पूज्यपाद संत श्री आशाराम जी गौशाला निवाई में गायों की देखभाल और उपचार की व्यवस्था उच्च गुणवत्ता की है। यहां प्रशिक्षित चिकित्सक गायों के स्वास्थ्य की देखरेख करते हैं और नियमित अंतराल पर सरकारी डॉक्टरों द्वारा टीकाकरण और स्वास्थ्य निरीक्षण होता है। गायों के स्वास्थ्य संबंधी चर्चा और अन्य गौशालाओं से संवाद भी होता है ताकि सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाया जा सके।


    गौशाला में सुरक्षा और स्वास्थ्य की निगरानी के लिए योग्य स्टाफ मौजूद है। गायों के भोजन की मानक निर्धारण और उनकी उचित खुराक के लिए पर्याप्त व्यवस्था है। यहां 30 बीघा में हरा चारा उगाया जाता है और गायों को शुद्ध पानी की आपूर्ति की जाती है। गर्भवती गायों का विशेष ध्यान रखा जाता है और उनके बच्चों के लिए उचित व्यवस्था की जाती है। प्रसब करने वाली गायों की विशेष देखभाल होती है और दूध संग्रहण के लिए प्रशिक्षित ग्वाल मौजूद हैं।

    दुर्घटनाग्रस्त गायों के लिए अलग व्यवस्था है और वृद्ध एवं अपाहिज गायों के लिए भी विशेष प्रबंध किए गए हैं। गौशाला में स्वच्छता का उच्चतम स्तर बनाए रखा जाता है। मृतक गायों को सम्मानपूर्वक जमीन में गाड़ने की व्यवस्था है।


    इस प्रकार, पूज्यपाद संत श्री आशाराम जी गौशाला निवाई में गायों की देखभाल और उपचार के लिए संपूर्ण और व्यवस्थित प्रणाली है जो उनके स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता देती है।



*       *       *       *       *

पीयूष (कोलोस्ट्रम) घी VS सामान्य घी

 

    देसी गाय का पीयूष (कोलोस्ट्रम) घी और सामान्य घी में अंतर: पारंपरिक, वैज्ञानिक और औषधीय दृष्टिकोण



परिचय:

    देसी गाय का पीयूष (कोलोस्ट्रम) घी और सामान्य घी दोनों ही भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन दोनों घी में कई समानताएं और अंतर भी होते हैं।

पारंपरिक दृष्टिकोण:

  • पीयूष घी: पारंपरिक रूप से, पीयूष घी को देसी गाय के बछड़े के जन्म के बाद पहले तिन दिन तक निकलने वाले दूध (पीयूष) से बनाया जाता है। इसे अत्यंत शुद्ध और  और उच्च औषधि गुण संपन्न  माना जाता है और इसका उपयोग  औषधीय प्रयोजनों  पर किया जाता है। जो सामान्य घी से १० गुना अधिक पोषक तत्व से भरपूर होता है | यह एक गाय से डेढ़ से दो साल में सिर्फ ३ दिन तक ही मिल पाता है |

  • सामान्य घी: सामान्य घी को किसी भी गाय के दूध से बनाया जा सकता है। इसका उपयोग दैनिक खाना पकाने और अन्य घरेलू उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

  • पीयूष घी: पीयूष घी में सामान्य घी की तुलना में प्रोटीन, विटामिन और खनिजों की मात्रा १० गुना तक अधिक होती है। इसमें इम्युनोग्लोबिन भी होते हैं, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं।

  • सामान्य घी: सामान्य घी में वसा, विटामिन ए और डी की मात्रा अधिक होती है।

    औषधीय दृष्टिकोण:

  • पीयूष घी: पीयूष घी को कई औषधीय गुणों वाला माना जाता है। इसका उपयोग  मस्तिष्क रोग , ह्रदय रोग , पाचन तंत्र को मजबूत करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, त्वचा विकारों का इलाज करने और वजन कम करने के लिए किया जाता है।

  • सामान्य घी: सामान्य घी को भी कुछ औषधीय गुणों वाला माना जाता है। इसका उपयोग कब्ज से राहत पाने, जोड़ों के दर्द को कम करने और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है।

    सार बात

    देसी गाय का पीयूष घी और सामान्य घी दोनों ही अपने-अपने गुणों के साथ महत्वपूर्ण हैं। पीयूष घी में पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है और इसे पारंपरिक रूप से अधिक औषधि गुण संपन्न  माना जाता है, जबकि सामान्य घी का उपयोग दैनिक जीवन में अधिक किया जाता है।

    टीप: यह लेख केवल जानकारीपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के लिए डॉक्टर से परामर्श ज़रूरी है।


*       *       *       *       *