Wednesday, 10 July 2024

बायोगैस का प्रयोग - गौशाला आधारित दृष्टिकोण

 



    गोबर गैस प्लांट की स्थापना के बाद इसे गोबर व पानी के घोल (1 : 1) से भर दिया जाता है और चलते हुए प्लांट से निकला गोबर (दस प्रतिशत) भी साथ ही डाल दिया जाता है। इसके बाद गैस की निकासी का पाइप बंद करके 10-15 दिन छोड़ दिया जाता है। जब गोबर की निकासी बाते स्थान से गोबर बाहर आना शुरू हो जाता है तो प्लांट में ताजा गोबर प्लांट के आकार के अनुसार सही मात्रा में हर रोज एक बार डालना शुरू कर दिया जाता है तथा गैस को आवश्यकतानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है एवं निकलने वाले गोबर को उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है जो गुणवत्ता के हिसाब से गोबर की खाद के बराबर होता है।

    तालिका 1 : विभिन्न क्षमता के संशाधित गोबर गैस प्लांट लगाने की लागत बनाने के लिए सामग्री की मात्रा

    11350 रू. प्रति हजार; 2140 रू. प्रति थैला; 312 रू. प्रति घन फुट; 47 रू. प्रति घन फुट; 530 रू. प्रति फुट; 6100 रू. प्रति मीटर; 7100 रू. प्रति लीटर

    तलिका 2 : विभिन्न क्षमता से संशोधित बायोगैस प्लांट के लिए पशुओं तथा निर्वाहित व्यक्तियों की संख्या

संशोधित गोबर गैस प्लांट

    जनता व दीनबन्धु डिजाइन के गोबर गैस प्लांट पानी व गोबर के घोल द्वारा चलाए जाते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध न होने के कारण किसान गोबर गैस प्लांट लगवाने के लिए तैयार नहीं होते। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग ने गोबर व पानी के घोल द्वारा चलने वाले जनता मॉडल के बायोगैस प्लांट को संशाधित करके ऐसा डिजाईन तैयार किया है जो ताजे गोबर से चलता है। इस प्लांट को गोबर डालने का आर सी पी पाइप एक फुट चौड़ा तथा पृथ्वी से 4 फुट ऊॅंचाई पर बना होता है। प्लांट के अंदर का भाग लीकेज रहित बनाया जाता है तथा गोबर की निकासी का पाइप पर्याप्त चौड़ा रखा जाता है जिससे गोबर गैस के दबाव से स्वत: बाहर आ जाता है। गैस की निकासी के स्थान को जी.आई. प्लास्टिक पाइप द्वारा रसाईघर तक चूल्हे से या फिर ईंजन द्वारा जोड़ दिया जाता है। इस प्लांट में बनी गैस की मात्रा अन्य सयंत्रों की अपेक्षा ज्यादा होती है तथा निकलने वाला गोबर जल्दी सूख जाता है जिसे इकट्ठा करने के लिए खङ्ढे की जरूरत नहीं पड़ती। इस प्लांट के आसपास की जगह साफ-सुथरी रहती है तथा इसे बनाने का खर्च अन्य संयंत्रों की अपेक्षा कम आता है (तालिका 1, 2)।

यदि आप कालोनी में या शहर में रहते हैं... आपका दो कमरे का मकान है... या आप कहीं चौथी मंजिल पर रहते हैं, तो भी आप गौपालन कर सकते हैं ।। भारतीय गौवंश के संरक्षण में आप भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं... यह काम आर्थिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही... स्वास्थ्य रक्षण का बेहतरीन काम भी सामुहिक रूप से गौशाला खोलकर किया जा सकता है... 

    एक बात.. सौ टके की... 

     भारतीय नस्ल की गाय विश्व में सर्वोत्तम मानी जाती है ।। पुराणों में और आयुर्वेद में दूध के जो श्रेष्ठ गुण वर्णित हैं, उनका संबंध कामधेनु कहलाने वाली भारतीय नस्ल की गायें से ही है ।। मां केदुध के पश्चात् सर्वाधिक लाभदायक, रोगों से लड़ने की शक्ति देने वाला, सुपाच्य, कम वसा युक्त, दैवी संस्कारों से युक्त तथा कैरोटीन युक्त दूध केवल भारतीय नस्ल की गाय ही देती है ।। इसी के दही, छाछ और घी का महत्व वर्णन किया जाता है ।। 

    भैंस का, जर्सी या संकर गायों का, सोयाबीन का या रासायनिक दूध, वह दूध नही है जिससे सही अर्थों में हमारा तन- मन स्वास्थ रह सके ।। मगर बाजार में तो यही सब मिल रहा है और मजबूरी में हम इसे ही ले भी रहे हैं ।। अब तो प्लास्टिक थैली में पैक दूध और पावडर दूध चलन में है जिसकी गुणवत्ता के बारे में कुछ कहना ही बेकार है ।। 

    बजारू दूध से बढ़ती बीमारियाँ- 

    राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के पशु शरीर क्रिया विज्ञान के वैज्ञानिकों के अनुसार आजकल पशुपालक दूध निकालने की प्रक्रिया में आक्सीटोसीन हार्मौन्स इंजेक्शन का बहुतायत से प्रयोग कर रहे हैं ।। यह इंजेक्शन सस्ता और लगाने में आसान होता है, इसके लगाने से पशु 20 प्रतिशत तक अधिक दूध देता है ।। अतः आजकल इसका अंधाधुंध उपयोग हो रहा है परन्तु इससे स्वास्थ्य भी तेजी से बिगड़ते जा रहा है ।। 

    महिलाओं में बार- बार गर्भपात होना, लड़कियों का कम उम्र में वयस्क हो जाना, स्तन कैंसर की शिकायतों का बढ़ना, बच्चों की आंखें, फेफड़े व दिमाग में खराबी आदि की शिकायतों के पीछे ऐसा दूध ही कारण है ।। जिन पशुओं को आँक्सीटोसीन देकर दूध निकाला जाता है, उनके दूध में कैल्शियम और वसा की कमी हो जाती है और सोडियम तथा नमक की मात्रा बढ़ जाती है ।। 

    सामुहिक गौशाला खोलिये- 

       आज जब आदमी 40- 40 हजार रु. की मोटर सायकल खरीद रहा है तब कुछ लोग थोड़ी- थोड़ी रकम लगाकर 10- 15 देशी गाय खरीदकर सामुहिक रूप से एक जगह उनका पालन- पोषण कर सकते हैं ।। अलग- अलग गाय पालने से यह बेहतर है ।। गौसेवा का पुण्य मिलेगा, शुद्ध दूध भी मिलेगा, आप एक परिवार को रोजगार भी दे सकेंगे और चाहे तो गोबर एवं गौ मूत्र से अन्य छोटे उद्योग भी चलाए जा सकते हैं ।। यह सामुहिक प्रयास समाज में सहकारिता, सहयोग और पारिवारिक भावना बढ़ाने वाला भी होगा... तब क्या विचार है... ?? 

        गाय का जीवन... हमारे स्वास्थ्य, संस्कृति, प्राकृतिक पर्यावरणीय संतुलन, अर्थतंत्र, कृषि, ऊर्जा सभी क्षेत्रों में कल्याणकारी प्रभाव डालता है। औद्योगिकीकरण, सर्वत्र हो रहा रासायनीकरण, शहरीकरण एवं तथाकथित आधुनिकीकरण के बढ़ते प्रयासों ने आज अनेकों उपद्रव खड़े कर दिये हैं। गौ पालन एवं संवर्धन द्वारा समाज में पुनः सुख समृद्घि का वातावरण लाया जा सकता है। इसी निमित्त से जन मानस को तैयार करना, इन गौ संवर्धन दीप यज्ञों का उद्देश्य है। 

       इन दीप यज्ञों का आयोजन ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही क्षेत्रों में किया जाना है। शहरों में इसलिए क्योंकि गौ आधारित औषधि उत्पादनों की शहरी क्षेत्रों में अधिक आवश्यकता है तथा हमारे शहर उनउत्पादों की बिक्री के लिए अच्छे बाजार का काम कर सकते हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि शहरों में धन साधन अधिक हैं, जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में भेजकर गौ संरक्षण संवर्धन की योजनाओं को बल प्रदान किया जा सकता है।

सावधानियाँ

1- गोबर गैस प्लांट लीकेज रहित होना तथा अच्छी किस्म की सामग्री से बना होना चाहिए।

2- गैस पाइप एवं अन्य उपकरण समय-समय पर जाँच करते रहना चाहिए।

3- गोबर की सूखी पर बनने से रोकने के लिए गोब डालने का एवं गोबर निकलने का पाइप ढका रहना चाहिए।

4- यह प्लांट निर्देशानुसार चलाने से वर्षों तक चल सकते हैं, जिससे गैस एवं खाद दोनो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर निम्नलिखित पते पर संपर्क किया जा सकता है -

अध्यक्ष, 

सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग, चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार - 125 004

source-http://hindi.indiawaterportal.org/node/29271



  *       *       *       *       *



No comments:

Post a Comment